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भोर

सूरज धो कर रखा है

सूख जाएगा अभी …

छठ जाएंगे बादल …

आसमान के शीर्ष को प्राप्त हो

दहकने लगेगा …..

पानी वाष्प बन उड़ जाएगा

और यह आग का गोला

सुखाने लगेगा पत्तों पर पड़ी

इठलाती ओस की बूंदों को

हवाओं की नमी को

और सभी चिरैया व्याकुल हो

निकल पड़ेंगीं पंखों को भिगोने

सूरज उसे भी सुखा देगा …

और संध्या होने तक

उसकी आंच धीमी पड़ जाएगी

बादल फिर से भर लेंगे

उसे अपनी बाहों में …

निहारिका सिंह

क्या लिखूँ

क्या लिखूं , तुम्हारे विषय में माँ !

शब्द नहीं मिल रहे वो

जिनमें तुम्हारा वर्णन कर सकूं

तुम्हारे रूप में मुझे

जो ईश्वर नें उपहार दिया

उस ममत्व से कीमती

कुछ नहीं संसार में

तुमने ही तो मुझे आकार दिया है

तुमने ही किया है पोषण माँ !

किन शब्दों में तुम्हारा

आभार करुं ,तुमने ही अपनी

सांसो से प्राण दियें हैं

तुमने ही मुझे

सही गलत का अंतर करना सिखाया

तुमने बहुत कठिनाई झेली

हम सब के लिए

कितनों के चुभते ताने सुने हैं

सब से लड़ कर

हमारे साथ खड़ी रही तुम माँ !

तुम अनमोल हो हमारे लिए

हमने कभी तुम्हारे बिन

अपना जीवन नहीं सोचा माँ !

मेरी तुमसे एक ही प्रार्थना है

कभी खुद से दूर मत भेजना माँ !

मैं तुम्हारे बिन जी नहीं पाऊंगी माँ!

मैं मैं अकेली पड़ जाऊंगी माँ !

निहारिका सिंह

हास्य-व्यंग्य

एक बार की बात है भैया हुयी भैंस लाचार
गर्दन पर रखी नेताओं ने अक्ल की तलवार
अक्ल की तलवार छीनते दोनो भाई
तभी पीछे से किसी ने आवाज़ लगायी
मिलो सप्रेम सभी से जी वक्त है ऐसा
न मिलेंगे वोट न ही एक भी पैसा
तभी media वालों की पड़ी वैन दिखलाई
दोनों ने डाल गले में हाथ फोटो संग खिंचवाई
अक्ल की तलवार छोड़ कर कुर्सी पकड़ी
भैंस बेचारी आज भी अक्ल संग पिसती

निहारिका सिंह

आक्रोश

भारत के हित को रोके जो , वो बन्धन आज तोड़ती हूँ ।
जो आक्रोश दबा बैठी थी , पुनः आज लिखती हूँ ।

घर के भेदी जो बन जायें ,विश्वास उसी ने ढ़ाया है
है अपना खून नही गद्दार , कोई भेदी घुस आया है
वह भेदी घुसकर आलय में , खूब तबाही मचा रहा
नवभारत की उम्मीदों को ,हर-क्षण खण्डित बना रहा

उन दुष्टों की मैली आकांशा लिख कागज़ मैला करती हूँ
जो आक्रोश दबा बैठी थी पुनः आज लिखती हूँ …….

उठो और पहचान करो , इन दुष्टों और गद्दारों की
आज समाप्त कर दो वो जड़ जो मनसा हो इन मक्कारों की
कांप उठेगा सम्पूर्ण विश्व ऐसी क्रान्ति हम लायेंगे
इनके आश्रयदाताओं को हम नानी याद दिलायेंगे

आज़ाद-लाहिड़ी-सावरकर को पुनः आज लिखती हूँ
राजगुरु-सुखदेव-भगत को कलम से सम्बोधित करती हूँ
जो आक्रोश दबा बैठी थी पुनः आज लिखती हूँ ….

निहारिका सिंह