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पुकार

हे नंदलाला दर्शन दो एकबार

हे गोपाला दर्शन दो एकबार ..

विपदा आन पड़ी है कान्हा

मुश्किल की ये घड़ी है कान्हा

डूबती नैय्या पार लगाओ

कब से पुकारूँ अब आ जाओ ..

सुन लो … मेरी पुकार …

हे नंदलाला दर्शन दो एकबार …

हे गोपाला दर्शन दो एकबार …

निहारिका सिंह

जो तुम आ जाते एक बार

अलख जलाकर प्रेम का
लें तेरे नाम का उच्छवास
और प्रकृति के कण -कण में
महसूस करूँ तेरा प्रवास

नीरस जीवन का प्रभु यही सार
जो तुम आ जाते एक बार …

मधुबन भी मधु-सा महके फिर
हो एक नयन भर तुम्हारा साथ
हमको बिसरे तुम , चोटिल मन है
आन पधारो हे द्वारिकानाथ !

नयन सजल हो लेते पद पखार
जो तुम आ जाते एक बार ..

निहारिका सिंह

घर में अकेली औरत

घर में अकेली औरत ..

ताकती रहती है देहरी की ओर

प्रेम भरे नेत्रों से …

करती है प्रतीक्षा पति की ..बच्चों की ..

उस अकेली औरत के

मित्र होते हैं जूठे बर्तन

उन्हीं के साथ खटपट होती है

फिर बड़े ही प्रेम से पोछती है उन्हें

रखती है सहेजकर सभी सामान .. रिश्ते भी ..

नही बिखरने देती .. नही होने देती खटपट ..

किसी की दासी नही होती है वह

उस महल की रानी होती है ..

रखती है अपनी निगरानी में सबकुछ ..

माँ बनकर पूरे परिवार को पोषित करती है ..

“अकेली औरत” ही परिवार को पूर्ण करती है ..

निहारिका सिंह

मूर्ख कौन

पागल हवा ….

घूमती रहती है .. भटकती रहती है ..

टकराती रहती है ..चट्टानों से …

फिर भी नही टूटती ..

नही कमजोर होते उसके इरादे …

और वो पगली , गली – चौबारे ..

गाँव ..शहर ..पहाड़ी ..वन …

देती रहती है फेरी …

मात्र सबको सुखी रखने के लिये ????

गधा भी यही करता है ..

और बैल भी … जो दूसरों के बारे में

सोंचता है .. चिन्ता करता है ..

लोग उसे पागल , मूर्ख कहते हैं ..

लेकिन हमें पता है कि मूर्ख कौन है …

निहारिका सिंह

रातरानी

रातों को तुम्हारा यूँ खिलना

सबसे भिन्न है , विशेष है ..

चाँद हर रात छू लेता होगा

अपने स्पर्श से खिला देता होगा भावों को

परिणय के सपनो को बल देता होगा

और तुम उन्ही सपनो को संजोकर

महक उठती हो .. खिल उठती हो ..

रात्रि के अन्धकार में तुम्हारे लिए ही

वो जुगनुओं की लालटेन लेकर आता है ..

तुम्हारा गौरवर्ण उस प्रकाश में

सम्मोहन का केंद्र मालूम पड़ता है ..

तुम्हारे प्रेम का प्रमाण

फैल जाता है पूरे वातावरण में

झींगुर प्रेम गीत गाने लगते हैं

मच जाती है चहलपहल जुगनुओं की

हवाएँ बाँट आतीं हैं समाचार ..

जिस चाँद को सब ताकते भर हैं

उसे तुम धरती पर ले आती हो ..

तभी तुम रात्रि की रानी कहलाती हो

निहारिका सिंह

भोर

सूरज धो कर रखा है

सूख जाएगा अभी …

छठ जाएंगे बादल …

आसमान के शीर्ष को प्राप्त हो

दहकने लगेगा …..

पानी वाष्प बन उड़ जाएगा

और यह आग का गोला

सुखाने लगेगा पत्तों पर पड़ी

इठलाती ओस की बूंदों को

हवाओं की नमी को

और सभी चिरैया व्याकुल हो

निकल पड़ेंगीं पंखों को भिगोने

सूरज उसे भी सुखा देगा …

और संध्या होने तक

उसकी आंच धीमी पड़ जाएगी

बादल फिर से भर लेंगे

उसे अपनी बाहों में …

निहारिका सिंह

क्या लिखूँ

क्या लिखूं , तुम्हारे विषय में माँ !

शब्द नहीं मिल रहे वो

जिनमें तुम्हारा वर्णन कर सकूं

तुम्हारे रूप में मुझे

जो ईश्वर नें उपहार दिया

उस ममत्व से कीमती

कुछ नहीं संसार में

तुमने ही तो मुझे आकार दिया है

तुमने ही किया है पोषण माँ !

किन शब्दों में तुम्हारा

आभार करुं ,तुमने ही अपनी

सांसो से प्राण दियें हैं

तुमने ही मुझे

सही गलत का अंतर करना सिखाया

तुमने बहुत कठिनाई झेली

हम सब के लिए

कितनों के चुभते ताने सुने हैं

सब से लड़ कर

हमारे साथ खड़ी रही तुम माँ !

तुम अनमोल हो हमारे लिए

हमने कभी तुम्हारे बिन

अपना जीवन नहीं सोचा माँ !

मेरी तुमसे एक ही प्रार्थना है

कभी खुद से दूर मत भेजना माँ !

मैं तुम्हारे बिन जी नहीं पाऊंगी माँ!

मैं मैं अकेली पड़ जाऊंगी माँ !

निहारिका सिंह